भारतीय संस्कृति सिखाती है विपरीत परिस्थितियों में जीना: संत कृपाराम
बच्चों को कार-बंगले के साथ शुभ संस्कार भी दीजिए- संत कृपाराम महाराज
बेटे और बेटी में कोई भेद न समझे- संत कृपाराम
बेटा अगर है हीरा तो मोती होती है बेटियां- संत कृपाराम
पब्लिक स्वर,दंतेवाड़ा /गीदम :- गुरुवर राजाराम महाराज के पावन सानिध्य में संत कृपाराम महाराज के मुखारविंद से जे. आर. पैलेस, गीदम, दंतेवाड़ा, छत्तीसगढ़ में आयोजित सप्त दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस में कथा का वाचन करते हुए कृपाराम महाराज ने भारतीय संस्कृति को बचाने के लिए कथा में आए हुए श्रोताओं को आह्वान किया की बच्चों को बचपन से ही संस्कार देने शुरू कर दो। संस्कार देने का सबसे बड़ा फर्ज है "मां" का। मां अगर चाहे तो बच्चे को कुछ भी बना सकती है अच्छे संस्कार दो उनको बताओ की हम किस की संताने है हमारे पूर्वजों के बारे में बताओ उनकी वीर कहानियां सुनाओ मां का कर्तव्य है बच्चों की सही परवरिश करना अगर सही संस्कार बचपन में ही मिल गए तो वो बड़े होने के बाद स्वामी विवेकानंद, महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी, श्रवण, झांसी की रानी लक्ष्मी बाई, कृष्ण जैसे वीर, योद्धा, देश भक्त, मातृ-पितृ भक्त, बन जाएंगे अगर सही संस्कार नहीं मिले तो वो आगे जाकर चोर, लुटेरा, कंस, दुर्योधन, रावण जैसे राक्षस न बन जाए। इसलिए संस्कार बचपन से ही दे देने चाहिए। आपका व्यवहार आपके बच्चों पर बहुत प्रभाव डालता है आज के जमाने में आप जो बोलते है वो बच्चे नहीं करते परंतु आप क्या करते है ये बच्चे जरूर करते है इसलिए बच्चों के सामने क्या बोलना है क्या नही, क्या करना है क्या नही, इस का विशेष रूप से ध्यान दे, शरीर का आकार तो भगवान बनाता है लेकिन जीवन का आकार संस्कार बनाते है इसलिए आपके कैसे संस्कार है वैसे ही आपका जीवन बनता है बच्चो को भौतिक सुविधाओ तथा कार बंगले के साथ -साथ संस्कारवान शिक्षा जरूर देवे जो आने वाली सातों पीढ़ियों का कल्याण करती है, संत श्री ने कहा विपरीत परिस्थितियों में भी कैसे रहना है कैसे नहीं ये सब हमें हमारी भारतीय संस्कृति सिखाती है। वसुदेव कुटुंबकम की भावना केवल और केवल भारत ही रखता है और बताया की कथा आदि संस्कारों को सींचने का कार्य करती हैं।
संत श्री ने ध्रुव प्रसंग का विस्तार से वर्णन करते हुए बताया कि गुरु का दर्जा पारस से भी बड़ा है पारस लोहे को सोना बनाता है पारस नहीं लेकिन गुरु तो अपने समान बना देता है, शिष्य गुरु का आज्ञाकारी व जिज्ञासु होना चाहिए। जवानी में सबसे ज्यादा मन भटकता है इसलिए जवानी में गुरु का होना अति आवश्यक है।
संत श्री ने कहा कि आज के इस आधुनिक युग में बेटी और बेटे में कोई भी भेद नहीं समझना चाहिए। दोनो को एक समान समझना चाहिए। दोनो को भगवान का प्रसाद समझ कर स्वीकार कर लेना चाहिए। बढ़ती दुनिया में लोगों की सोच स्नकीर्ण होती जा रही है। दहेज की कुप्रथा समाज से बहिष्कार करना चाहिए। बेटियों को ऐसे संस्कार देना चाहिए जिससे वो समाज में आपका नाम रोशन कर दे। बेटियों को भी पढ़ना चाहिए।
संत श्री ने आजामिल उद्धार के प्रसंग को सुनते हुए कहा की अपने बच्चो के नाम रखे तो एसे रखे जिसमे कोई सार हो, जिसमे संस्कार झलके तथा संस्कृति पृष्ठ हो।जैसे राम नाम कितना अच्छा है लेकिन कोई रावण नाम नहीं रखता क्यों की नाम का असर व्यक्ति के जीवन पर बहुत प्रभाव डालता है। लोग अपनी संस्कृति भूलते जा रहे है।
संत श्री ने भगवान के अलग-अलग रूप सूर्य वंश, राजा अंबरीष, राजा,कपिल मुनि,भगीरथ की कथा का वाचन किया व पहलाद व हिरण्यकश्यप की कथा के साथ श्री कृष्ण जन्म कथा का विस्तृत वर्णन किया। महराज जी ने कथा में भजनों की प्रस्तुति से श्रद्धालुओं का मन मोह लिया....
बाल संत जगदीश व घनश्याम ने मनमोहक कीर्तन व भजनों से उपस्थित गौभक्तों का मन मोह लिया। कथा में भगवान के अलग-अलग रूप की झांकियों का प्रदर्शन भी किया गया।